उनकी पत्नी सनीमा बेग़म 28 मई के दिन को याद करते हुए कहती है, "मेरे
पति फ़ौज में रह चुके हैं और अब बॉर्डर पुलिस में काम कर रहे थे. इसलिए
उन्हें कोई पकड़ कर ले जाएगा, ऐसी बात दिमाग़ में कभी आई ही नहीं थी. जब
इन्हें थाने में बुलाया गया तब तक मेरे मन में किसी तरह की टेंशन नहीं थी. लेकिन जब ये पूरी रात घर नहीं आए तो मुझे काफ़ी चिंता हुई. दूसरे दिन मुझे
रिश्तेदारों ने बताया कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है. यह सुनकर मेरा शरीर कांपने लगा था. मैं उनसे मिलने पहुंची लेकिन पुलिस ने ज़्यादा
बात करने नहीं दिया और उन्हें ग्वालापाड़ा ले गई."
वो बताती हैं, "हमारे साथ बहुत बुरा हुआ है. आप सोचिए रमज़ान का महीना चल रहा था. मैं रोज़ा रखे हुए थी. बच्चे रो रहे थे. घर का पूरा माहौल टेंशन में आ गया था. देश की सेवा करने वाले व्यक्ति को कारागार में डाल दिया गया. अभी केवल ज़मानत मिली है. आगे क़ानूनी लड़ाई लड़नी होगी. पैसा भी चाहिए होगा. लेकिन अदालत पर भरोसा है वो मेरे पति को सही सलामत छोड़ देंगे."
असम में सनाउल्लाह का यह इकलौता मामला नहीं है. इसके अलावा पूरे राज्य में ऐसे कई सैनिक और पूर्व सैनिकों के मामले सामने आए हैं जिन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने को कहा गया है.
इससे पहले साल 2017 में सनाउल्लाह के एक ममेरे भाई मोहम्मद अजमल हक़ को भी फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल की तरफ से 'संदिग्ध नागरिक' होने का नोटिस भेजा गया था. मोहम्मद अजमल हक़ भी 30 साल सेना में काम करने के बाद 2016 में जूनियर कमीशन अफ़सर (जेसीओ) के पद से रिटायर हुए थे.
मोहम्मद सनाउल्लाह को डिटेंशन सेंटर में भेजने को लेकर उनकी बड़ी बेटी शहनाज़ अख़्तर प्रशासन के कामकाज़ पर सवाल उठाते हुए कहती है, "मैंने अपने पिता को फौज़ की वर्दी में देश के लिए काम करते हुए देखा है. उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था. इंडियन आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देना का मतलब कलेजा फट जाने जैसी बात थी. मुझे अपनी पिता पर गर्व है."
वो कहती हैं, "सेना में नौकरी के दौरान मैं अपने पिता के साथ कई जगह रही. लोग पूछते है कि नॉर्थ ईस्ट में ऐसा क्यों हो रहा है. आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को ही जेल में डाल दिया जा रहा है तो आम आदमी का कितना बुरा हाल होता होगा."
"ये सारी परेशानी प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद कमियों के कारण हुई है. मेरे पिता के मामले के जांच अधिकारी रहे चंद्रमल दास के कारण ही आज हमें यह दिन देखना पड़ा है."
सनाउल्लाह मामले के जांच अधिकारी चंद्रमल दास के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया है. जिन कथित गवाहों के आधार पर वो रिपोर्ट तैयार की गई, उनका कहना है कि उन्होंने कभी गवाही दी ही नहीं.
चंद्रमल दास पिछले साल बॉर्डर पुलिस से रिटायर हो चुके हैं लेकिन 23 मई के फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल अदालत के फ़ैसले के बाद समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति की उन्होंने जांच की वो सनाउल्लाह थे न कि मोहम्मद सनाउल्लाह, इसलिए ये प्रशासनिक भूलचूक का मामला है.
सनाउल्लाह के मामले में कथित गवाही देने वाले कुरान अली, सोबाहान अली और अमज़द अली, ये सभी असम के कामरूप ज़िले में कलाहीकाश गांव के रहने वाले हैं. लेकिन अब इन तीनों का कहना है कि उन्होंने जांच अधिकारी चंद्रमल दास से कभी बात ही नहीं की.
असम में विदेशी नागरिकों के मामलों की सुनवाई के लिए इस समय सौ ट्रिब्यूनल चल रहे हैं. इस व्यवस्था के तहत एफटी में नियुक्त सदस्य विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत यह देखते हैं कि जिस व्यक्ति पर मामला है वो एक विदेशी है या नहीं. हालांकि इस एफटी के कामकाज़ को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.
अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए गठित इन विदेशी ट्राइब्यूनल ने अब तक करीब 900 लोगों को 'विदेशी' घोषित किया है जिसके बाद इन लोगों को राज्य के छह अलग-अलग डिटेंशन सेंटर में रखा गया हैं. इनमें से लगभग सभी लोग बंगाली भाषी मुसलमान या हिंदू हैं.
मोहम्मद सनाउल्लाह का मामला बेहद संवेदनशील और गंभीर है. पिछले कुछ दिनों में फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल से लेकर पुलिस के स्तर पर जो कार्रवाई हुई है उससे कई सवाल खड़े हो गए है.
दरअसल, बॉर्डर पुलिस ने सनाउल्लाह को हमेशा के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया है और उनसे वर्दी वापस ले ली है. ऐसे में अब इस मामले में सबकी नजर गुवाहाटी हाई कोर्ट पर टिकी है. देखना होगा आने वाले समय में देश की फौज में काम करने वाला यह व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक साबित कर पाता है या नहीं.
वो बताती हैं, "हमारे साथ बहुत बुरा हुआ है. आप सोचिए रमज़ान का महीना चल रहा था. मैं रोज़ा रखे हुए थी. बच्चे रो रहे थे. घर का पूरा माहौल टेंशन में आ गया था. देश की सेवा करने वाले व्यक्ति को कारागार में डाल दिया गया. अभी केवल ज़मानत मिली है. आगे क़ानूनी लड़ाई लड़नी होगी. पैसा भी चाहिए होगा. लेकिन अदालत पर भरोसा है वो मेरे पति को सही सलामत छोड़ देंगे."
असम में सनाउल्लाह का यह इकलौता मामला नहीं है. इसके अलावा पूरे राज्य में ऐसे कई सैनिक और पूर्व सैनिकों के मामले सामने आए हैं जिन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने को कहा गया है.
इससे पहले साल 2017 में सनाउल्लाह के एक ममेरे भाई मोहम्मद अजमल हक़ को भी फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल की तरफ से 'संदिग्ध नागरिक' होने का नोटिस भेजा गया था. मोहम्मद अजमल हक़ भी 30 साल सेना में काम करने के बाद 2016 में जूनियर कमीशन अफ़सर (जेसीओ) के पद से रिटायर हुए थे.
मोहम्मद सनाउल्लाह को डिटेंशन सेंटर में भेजने को लेकर उनकी बड़ी बेटी शहनाज़ अख़्तर प्रशासन के कामकाज़ पर सवाल उठाते हुए कहती है, "मैंने अपने पिता को फौज़ की वर्दी में देश के लिए काम करते हुए देखा है. उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था. इंडियन आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देना का मतलब कलेजा फट जाने जैसी बात थी. मुझे अपनी पिता पर गर्व है."
वो कहती हैं, "सेना में नौकरी के दौरान मैं अपने पिता के साथ कई जगह रही. लोग पूछते है कि नॉर्थ ईस्ट में ऐसा क्यों हो रहा है. आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को ही जेल में डाल दिया जा रहा है तो आम आदमी का कितना बुरा हाल होता होगा."
"ये सारी परेशानी प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद कमियों के कारण हुई है. मेरे पिता के मामले के जांच अधिकारी रहे चंद्रमल दास के कारण ही आज हमें यह दिन देखना पड़ा है."
सनाउल्लाह मामले के जांच अधिकारी चंद्रमल दास के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया है. जिन कथित गवाहों के आधार पर वो रिपोर्ट तैयार की गई, उनका कहना है कि उन्होंने कभी गवाही दी ही नहीं.
चंद्रमल दास पिछले साल बॉर्डर पुलिस से रिटायर हो चुके हैं लेकिन 23 मई के फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल अदालत के फ़ैसले के बाद समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति की उन्होंने जांच की वो सनाउल्लाह थे न कि मोहम्मद सनाउल्लाह, इसलिए ये प्रशासनिक भूलचूक का मामला है.
सनाउल्लाह के मामले में कथित गवाही देने वाले कुरान अली, सोबाहान अली और अमज़द अली, ये सभी असम के कामरूप ज़िले में कलाहीकाश गांव के रहने वाले हैं. लेकिन अब इन तीनों का कहना है कि उन्होंने जांच अधिकारी चंद्रमल दास से कभी बात ही नहीं की.
असम में विदेशी नागरिकों के मामलों की सुनवाई के लिए इस समय सौ ट्रिब्यूनल चल रहे हैं. इस व्यवस्था के तहत एफटी में नियुक्त सदस्य विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत यह देखते हैं कि जिस व्यक्ति पर मामला है वो एक विदेशी है या नहीं. हालांकि इस एफटी के कामकाज़ को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.
अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए गठित इन विदेशी ट्राइब्यूनल ने अब तक करीब 900 लोगों को 'विदेशी' घोषित किया है जिसके बाद इन लोगों को राज्य के छह अलग-अलग डिटेंशन सेंटर में रखा गया हैं. इनमें से लगभग सभी लोग बंगाली भाषी मुसलमान या हिंदू हैं.
मोहम्मद सनाउल्लाह का मामला बेहद संवेदनशील और गंभीर है. पिछले कुछ दिनों में फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल से लेकर पुलिस के स्तर पर जो कार्रवाई हुई है उससे कई सवाल खड़े हो गए है.
दरअसल, बॉर्डर पुलिस ने सनाउल्लाह को हमेशा के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया है और उनसे वर्दी वापस ले ली है. ऐसे में अब इस मामले में सबकी नजर गुवाहाटी हाई कोर्ट पर टिकी है. देखना होगा आने वाले समय में देश की फौज में काम करने वाला यह व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक साबित कर पाता है या नहीं.
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